Friday, 22 August 2025

Regimen of diet according to Ayurveda (भोजन करण्याचे आयुर्वेदोक्त नियम)

1) काले – Food should be taken at the proper time,

2)   सात्म्ये-food should be familial, acceptable 

3) शुचि – it should be clean

4) हितं -good for health

5) स्निग्ध,उष्ण,लघु – unctuous, hot and easily digestible

6) तन्मना – consume food with attention, presence of mind

7) षड्रसं मधुरप्रायं-   – should contain all the six tastes predominance of sweet taste

 8) अतिद्रुतविलंबितं- food should eat  neither very quickly nor very slowly

9)स्नात क्षुव्दान्- food should eat after taking bath and  having good hunger,

10) विविक्तस्थो-sitting in peaceful and quiet place

11)धौतपादकरानन – Take food after washing the feet, hands and face,

12)तर्पयित्वा पितृन देवानं अतिथीन् बालकांवर गुरून्

 after satisfying the  manes , gods, guests, children and teachers 

13)प्रत्यवेक्ष्य तिरश्चो S पि -

food should be taken after satisfying  the dependents  in the house ,pet animals and birds as their needs and likings

14) समीक्ष्य सम्यगात्मानमनिन्दन्नब्रुवन् द्रवम्-

Eat healthy food , without abusing the food, without too much of talk. Food should contain more of liquid .

15) इष्टमिष्टै:theसहाश्नीयाच्छुचिभक्तजनाहृतम्- 

Eat fevorite and healthy food in the company of the liked persons, and served by those who are clean and faithful  . 


संदर्भ (reference):-अ.हृ.सू 8/35-38

Vd Pratibha Bhave

Sukhkarta Ayurvedic Panchkarma and fertility center Pune 

8766740253

वर्षा ऋतुचर्या (Monsoon Season Regimen)

 स्वस्थ रहने के लिए ऋतु के अनुसार खान, पान, विहार आयुर्वेद मे विस्तार से बताया है 


 शिशिरो s थ वसन्तश्च ग्रीष्मो वर्षाशरद्विमा: ll1ll 


भारत देश मे 6 ऋतु दिखाई देते हैं l


 आचार्य सुश्रुत के काल मे भाद्रपद अश्विन  महिने मे वर्षा ऋतु के बताया हैं l


उनके बाद आचार्य वाग्भट हुए l तब श्रावण व भाद्रपद  महिने  मे वर्षा ऋतु की लक्षण बताये है l


अभी 2025 साल मे तो  वैशाख ज्येष्ठ महिने मे वर्षा ऋतु के लक्षण प्रस्थापित हुये हैं l 


इसलिए स्वस्थ रहने के लिए ऋतु के लक्षण का अनुसरण करना ,आहार का विहार करना बहुत महत्वपूर्ण है l


वर्षा ऋतु मे आकाश पानी से भरे बादलोंसे घिरा रहता है l तुषार मिश्रित वायु एकदम चलती रहती है, पृथ्वी के बाष्प के कारण, अम्लपाकी,मलिन पानी के कारण पचनशक्ती मंद हो जाती है l 


तुषार युक्त वायु+बाष्प+अम्लपाकी,मलिन पानी +पचनशक्ती मंद = वात पित्त कफ दूषित होते है 


वर्षा ऋतुचर्या:- 


भजेत्साधारणंसर्वमूष्ण स्तेजनं च यत्ll44 ll


साधारण आहार विहार करे l उष्ण गुण के पदार्थ , पचन शक्ती बढाने वाले पदार्थोंका खान पान मे प्रयोग करे l


आस्थापनं शुद्धतनुर्जीर्णं धान्यं रसान् कृतान् l —------------45-48 


औषधी काढे के,(आस्थापन) बस्ती ले l 


1 साल पुराने गहू तांदूळ,डाळ , ज्वार इत्यादी अन्नपदार्थ आहार मे लेना चाहिए l 


पुराने अन्नपदार्थ पचनेमे हलके होते है, कफ पित्त भी दूषित नहीं होते l 


जंगली पशु के मांस सूप या  मूग दाल सूप को तेल, घी, सुंठ, पिंपली, चित्रक, चव्य, पिपलीमूल  आदी से छोंक देकर गरम गरम पीना चाहिए l दही को कपडे मे बांधकर पानी निकाले, पानी को मस्तु कहते है l 


मस्तु मे भरपूर नमक डालकर या सुंठ, पिंपली, चित्रक, चव्य, पिपलीमूल मिलाकर पीना चाहिए l खट्टा, नमक, घी तेल युक्त पचनेके लिये हलका भोजन करेl


बिना पानीवाले, सूखे पदार्थोंका भोजन मे प्रयोग करे lपुराने शहदका खान पान मे प्रयोग करे lपुराने आसव अरिष्ट का प्राशन करे l आकाश से गिरनेवाला जल,कुएँ का जल उबालकर शुद्ध  करके खान पान के लिए उपयोग करे l


दिव्यं कौपं शृतं चाम्भो भोजनं 


त्वति दुर्दिने ll 46ll 


व्यक्ताम्ल लवण स्नेहं संशुष्कं क्षौद्रवल्लघु ll


वर्षा ऋतु मे पैदल न चले,किसी वाहन का उपयोग करे l सुरभी गंध धारण करे l 


वस्त्रोंको रोज धूप देवे l मकान मे उची जगह पर जहाँ बाष्प, शीत और शीकर (जलकण) न पहूँच सकें वहा वहां रहेl 


अपादचारी सुरभि: सततं धूपितांबर: ll47ll हर्त्यपृष्ठे वसेत् बाष्पशीतशीकर वर्जिते l


नदी का जल , पानी मे मिले सत्तू, दिन में सोना, परिश्रम, धूप से बचे l


संदर्भ:-अष्टांग हृदय सूत्रस्थान  अध्याय 3 


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Vd Pratibha Bhave 


Sukhkarta ayurvedic panchkarma and family centre Pune 


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आयुर्वेद #पंचकर्म उपचार मे बस्ति चिकित्सा

 वातप्रधान दोषों में अथवा केवल वात के कारण होनेवाले रोगों में बस्ति दी जाती है l


पंचकर्मोमे ‘बस्ति’चिकित्सा श्रेष्ठ, अग्रणी है l


#बस्ति शरीर मे प्रविष्ट करने के लिये 3 मार्ग है l

गुदमार्ग (Anus)

मूत्रमार्ग(Urethra)

योनीमार्ग (Vagina)


जब औषधी,काढे के रुप मे देते है तो उसे निरुहबस्ति या आस्थापन बस्ति कहते है l

बस्ति जब तेल स्वरूप मे देते है तो उसे

 अनुवासन बस्ति कहते है l


योनीमार्ग से गर्भाशय मे और मूत्र मार्ग से मूत्राशय मे बस्ति देते है उसे #उत्तरबस्ति कहते है l


बस्ति कब, कौनसी, कितनी मात्रा देनी है , यह रोगोंका का स्वरूप, ऋतु, वय, पचनशक्ती आदीं परीक्षण करके  देते है l


वैद्य द्वारा बताये गये नियमों का पालन करते हुए,

युक्ती से बालक, वृद्ध , मुसाफिर, हमाल, व्यायाम, फ्रॅक्चर,चिंता करनेवाले, निर्बल, अमीर, गरीब, स्त्री, पुरुष सबको बस्ति दे सकते है l


कपडे को अगर रंगयुक्त पानी मे भिगोने से, वह कपडा रंगीत हो जाता है, उसीप्रकार  बस्ति चिकित्सा 

शरीर मे  संचित सिर्फ मल को निकालती है l 


यथा कुसुम्भादियुतात्तोयाद्रागं हरेत्पट: l

तथा द्रवीकृतात्देहात्बस्ति :निर्हरते मलान् ll 84ll


सब रोग का कारण बिघडा हुआ बढा हुवा वायु है और वायू के शान्ति के लिये बस्ति के सिवाय दूसरी चिकित्सा नहीं l


बस्ति चिकित्सा संपूर्ण चिकित्सा प्रकारोंका आधा भाग है, कई आचार्य बस्ति को संपूर्ण चिकित्सा मानते है l


तस्या अतिवृद्ध्यस्य शमाय नान्यद्वस्तेर्विना भेषजमस्ति किंचित् ll86ll

तस्मात् चिकित्सार्ध्य इति प्रदिष्ट: कृत्स्ना चिकित्सा s पि च बस्तिरेकै: l


 सर से पांव तक सभी व्याधी मे बस्ति चिकित्सा से लाभ होता है l


वातोल्बणेषु दोषेषु  वाते वा बस्तिरिष्यते l

उपक्रमणां सर्वेषां सो sग्रणी  स्त्रिविधस्तु स: ll1ll

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संदर्भ: अष्टांग हृदय सूत्रस्थान अध्याय 19

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Vd Pratibha Bhave 

Ayurvedic Gynaecologist Pune 

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प्रमेह -मधुमेह prediabetes-#diabetes

 आयुर्वेद के मत से प्रमेह होने के कारण क्या हैं?(#Prediabetic)


1)बीजदोष से (Genetic) 

2) अपथ्य आहार विहार से 

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जात: प्रेमही मधुमेहिनो वा न साध्य उक्त: स हि बीजदोषात् ------------------  असाध्यान् ll चरक चि 6/57

  व्दौप्रमेहौ भवत: सहजो s पथ्य निमित्तश्च ll सुश्रुत चि 11/3

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1)बीजदोष(Genetic)- माता पिता के बीज मे प्रमेह करनेवाले दोष के कारण बच्चे को जन्मजात मधुमेह हो जाता हैं l 


2) अपथ्य आहार विहार से 

–--------- तेषां मेदो मूत्र कफा वहम् ll 1ll

अन्नपानक्रियाजातं यत् प्रायस्तत्प्रवर्तकम् l


प्राय: जो आहार विहार मेद (fat), कफ और मूत्र को बढाने वाले होते हैं वो सब प्रमेह को उत्पन्न करने वाले हैं l 

जैसे -मीठा, खट्टा, नमकीन, स्निग्ध पदार्थ, पचन होने मे भारी पदार्थ, चिकने, ठंडे पदार्थ 

नये धान्य, सुरा, जलचर प्राणी के मांस, गुड, दूध, दुधसे बने पदार्थ

—--- एक स्थान पर बैठे रहना , सोने का कोई नियम ना होना l

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प्रमेह के लक्षण:- 

सभी प्रमेह का सामान्य लक्षण प्रभूत अविल मूत्रता हैl 

प्रभूत मात्रा मे  और अविल याने रंग मे मलिन, मूत्र प्रवृत्ती होना l

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आयुर्वेद मे 20प्रकारके प्रमेह बताये हैं l


अगर प्रमेह की ठीक से चिकित्सा नहीं की तो सभी 20प्रमेह , मधुमेह में बदल जाते हैं l 


मधुमेह मे मध के समान मूत्रप्रवृत्ति होती हैं l

मधु याने मध/शहद 

मेह याने मूत्रप्रवृत्ति 

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प्रमेह पूर्वरूप :- प्रमेह होने के पहिले शरीर में कुछ लक्षण उत्पन्न होते है, उसे प्रमेह के पूर्वरुप कहते हैं l


पूर्वरुप:-

—- पसीना आना, शरीर दुर्गंधी, शरीर मे ढीलापन , आराम करना, बैठे रहना,नींद , सुखी जीवन की इच्छा होना l

—----- हृदय, आँखें, जीभ , कान मे अधिक मल तयार होना, शरीर भारी लगना 

--- केश और नख बहुत जलद गती से बढना ,

----  ठंडी चीजें बहुत पसंद होना ,

---- गले और तालु में सुखापन, मुख में मीठापन ,

--- हाथ पैर में जलन, मूत्र पर चिटियों का आना 


ये सब लक्षण भविष्य में प्रमेह होने के संकेत देते हैं l

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मधुमेह शरीर में किस प्रकार से उत्पन्न होता हैं?, (#etiopathology of diabetes)


मधुमेह दो प्रकार से उत्पन्न होता हैं l


,”मधुमेहो मधुसमं, जायते स किल द्विधा ll 18ll

क्रुद्धे धातु क्षयाद्वायौ दोषा वृतपथेsथवा l”

 अष्टांग हृदय निदानस्थान 10



1) हमारा शरीर रस रक्त मांस मेद अस्थि मज्जा शुक्र ये सात धातु से बना हैं l ये धातु का पोषण अंश की कमी के कारण उनका क्षय होता हैं l 

धातुक्षय के कारण वात बढता हैं, विपरीत कार्य करने लगता हैं l धातुक्षय के कारण क्रुद्ध हुवा वात मूत्राशय को दूषित करता हैं और प्रमेह का कारण बनता हैं l

यह प्रमेह ठीक नहीं होता l


2) अत्यधिक पोषण युक्त, मीठा आदी अन्न खाना, सोने का नियम नहीं होना, आलस से जीवन बिताना आदी कफ, मेद, मूत्र बढाने वाले कारणों से ,

वात पित्त कफ जिस मार्ग से शरीर में बहते हैं उस मार्ग मे बाधा ,अवरोध  हो जाता हैं l

बाधा होने के कारण वायु क्रुद्ध होकर बस्ती/मूत्राशय को दूषित कर  प्रमेह उत्पन्न करता हैं l


इस प्रकार मे अगर मेद (fat) बहुत दूषित नहीं हुई हो तो यह प्रमेह ठीक होता हैं 


साध्यास्तु मेदो यदी नातिदुष्टम् ll41ll अष्टांग हृदय निदानस्थान 10 


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आयुर्वेदिक उपचार - अष्टांग हृदय चिकित्सा स्थान 12


प्रमेह रोगी बलवान है तो सर्व प्रथम वमन विरेचन दे l

मसाज के लिये दोष के अनुसार तेल का चयन करे l

वमन विरेचन होने के बाद वात पित्त कफ के अनुसार औषधी काढे का बस्ति दे l


शरीर शुद्ध होने पर मांस सूप/ सत्तू दे l पुन्हा व्याधी न बढे उसके लिये औषध,आहार,विहार के नियम का पालन करे l


**अगर रोगी बलवान नहीं हैं तो वमन,विरेचन नहीं करना सब रोगी को औषध दे l


औषधी:-प्रमेह के लिए अनेक प्रकार के औषधि हैं l

जैसे 

 -आँवले के रस मे हल्दी मिलाकर थोडा शहद मिलाकर सुबह खाली पेट ले l

- गिलोय के रस मे शहद मिलाकर दे l

- वात पित्त कफ के अनुसार परीक्षण करके औषध का चयन किया जाता हैं l

- नवयास चूर्ण 

- धान्वंतर घृत खाने के लिये बरते

- शुद्ध शिलाजीत शास्त्रोक्त नियम से सेवन करे

- प्रमेह मे उद्वर्तन ( रुक्ष चुर्ण मसाज), भरपूर व्यायाम, रात्री जागरण, कफ व मेद (fat) नष्ट करनेवाले औषध और क्रिया करे

– प्रमेह रोगी अगर कृश हैं तो मेद एवं मूत्र न बढे इस प्रकार का आहार और औषधी देकर पुष्ट करे, वजन 

बढाये l

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मधु मेहित्व मापन्नो भिषग्भि: परिवर्जित: ll 43 ll

शिला जतुतुलामद्यात्प्र मेहार्त:  पुनर्नव: ll 44 lllअष्टांग हृदय चिकित्सा स्थान 12


मधुमेह की अवस्था मे, वैद्य ने भी ठीक न हो पाएगा, असाध्य कह कर रोगी को छोड दिया हो , फिर भी शिलाजीत विधिवत प्रमाण मे खाने से उसका शरीर फिर से नया हो जाता हैं l

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टीप:- आयुर्वेद मे prediabetic के पहले की अवस्था जिसे प्रमेह के पूर्वरुप कहा हैं, अगर यह लक्षण उत्पन्न हो तो तुरंत आहार विहार और औषध के द्वारा प्रमेह -  मधुमेह को रोका जा सकता हैं l

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Vd Pratibha Bhave 

MD Ayurveda 

Sukhkarta Ayurvedic Panchkarma and fertility center Pune

8766740253

Safe Ayurvedic Medicines in Pregnancy

 **All ayurvedic medicines are not safe during pregnancy

**Acharya described specific line of treatment  for diseases in pregnancy .


व्याधींश्चास्या मृदु मधुर शिशिर सुखसुकुमार प्राये: औषध आहार उपचारे: उपचरेत, न चा —--- 


Diseases of pregnant woman should be treated with soft,sweat,cold,pleasing and gentle medicines, dietetics and behavior.


इत्यनात्ययिके व्याधौ विधिर त्य धिके पुन :l   तीक्ष्णे : अपि क्रिया योगै: स्त्रियं यत्नेन पा ल ये त् ll 63ll

अ.सं. शा2/63


If the disease is very serious,the life of woman should be saved by use of drastic measures and pungent drugs 


सूक्ष्मां चिकित्सां वक्ष्यामि गर्भिणीनां  विभागश: l

तथा गर्भश्च नारी च वर्धते रक्ष्यते s पि च ll

 का. सं खि 10/3

Advised to prioritise fetal and maternal safety by Monitoring condition closely .


Therefore 

- Examine properly ,

- Diagnose perfectly and 

- Treatment should be given cautiously with safe medicines.

-Then only it would helpful for protection and development of both mother and fetus


Ayurveda describes  medicines useful in pregnancy.


 बहुप्रजा/कंटकारी Solanum virginianum

अनंता /सारिवा / Hemidesmus indicus 

ईश्वरी (aristolochia indica)

मुदिता ,/शिवलिंगी Bryonia laciniosa

इंद्रावारुणी Citrullus colocynthis

सहदेवी Vernonia cinerea

जीवक Malaxis acuminata

ऋषभक Malaxis muscifera 

भारंगी Clerodendrum indicum 

आत्मगुप्ता Mucunapruriens

पूतना/हरड Terminalis chebula 

जटामांसी Nardostachysjatamansi

जेष्ठमधGlycyrrhiza glabra,

गोक्षुर Tribulus terrestris

न्यग्रोधादी गण, क्षीरी वृक्ष, 

किन्जल /अश्वकर्ण Terminalia paniculata 

शृंगाटक /सिंहारा,Trapa bispinosa

पुष्कर /पोखर बीज Inula racemosa

कसेरूScirpus grossus

पद्म ,उत्पल ,कुमुद ,Nymphaea alba 

शालूक Nelumbo nucifera

अतिबला Abutilon indicum


शाली, षष्टीक, रक्तशाली - चावल के प्रकार 


इक्षु /गन्ना का मूल Saccharum officinarum

काकोलीRoscoea purpurea,

शाकबीज/सागौन का बीज Tectona grandis 

पयस्या /अर्क पुष्पी pomoea paniculata,

 सुरदारु/देवदार Cedrus deodara

अश्मन्तक/अम्लीPiliostigma malabaricum

ताम्रवल्लि/ मंजिष्ठा Rubiacordifolia

वृक्षादनी/बांदा/Dendrophthoe falcata

 पद्मा/ पद्मकाष्ठ Prunus cerasoides

 बृहती द्वय - रिंगणी डोरली 

Solanum indicum Solanum xanthocarpum

क्षीरी वृक्ष - त्वचा - शृंग, वड , उंबर, पिंपळ, पारस पिंपळ और प्लक्ष /पाकड/राम अंजीर Ficus lacor

पृश्निपर्णी /पिठवन /डबरा Uraria picta

 शिग्रु/मुनगा Moringa oleifera 

मधुपर्णिका/काश्मरी/गंभारीGmelina

arborea

बिस = बेर/ बाँस

 द्राक्षा Vitis vinifera

कपित्थ Limonia acidissima

बिल्व Aegle marmelos, पटोल- Trichosanthes dioica

निदिग्धिका मूल - Solanum xanthocarpum



Some of them for external use only,some of them external and internal use.

Some of them have advised the oral use of milk or Ghrita prepared with these drugs .

Some of them should be tied in the waist of pregnant woman.

Some of them useful for bathing, oil massage.

These medicines are considerably safe if woman suffer from disease during pregnancy .


Reference:- 

Charak Sharir Sthan 8/20,22

Charka sharir Sthan 8/24 

Ashtang Hruday Sharir Sthan 1/49

Ashtang Sangrah Sharir Sthan 1/62

and Sushrut sharir Sthan 10/58

 Kashyapa Samhita khilsthan 10/177-181

Harit Samhita Tritiya Sthan 51

Ayurvedia Prasutitantra evam Striroga - prof Premvati Tiwari



Vaidya  Pratibha Bhave 

MD Ayu Obstetrics and Gynaecology

Pune 

8766740253


Thank You

शरीर में पित्त के कार्य

 जब पित्त शरीर में संतुलित स्थिती में रहता है 

तो शरीर के लिये उपयोगी काम करता हैं l


असंतुलित होने पर बीमारियों को पैदा करता हैं l


संतुलित पित्त के कार्य:- 

आहार का पाचन करना 

आखों से देखना 

शरीर की उष्मा उचित मात्रा मे बनाये रखना 

शरीर का प्राकृत वर्ण बनाये रखना 

शौर्य, हर्ष,उत्साह, मानसिक प्रसन्नता 


असंतुलित पित्त के कार्य:- 

आहार का पाचन न होना 

ठीक से दिखाई न देना 

कभी बहुत उष्मा या बहुत कम उष्मा होना 

वर्ण विकार उत्पन्न होना 

डर लगना, भयभीत होना,

क्रोध बढना, मोह उत्पन्न होना, उत्साह न होना,

 खिन्न रहना , उदास रहना 


संदर्भ:- च. सूत्रस्थान 12/11

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Vd Pratibha Bhave 

Sukhkarta Ayurvedic Panchkarma and fertility center Pune 

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शरीर में पित्त के स्थान

पित्त शरीर में यहाँ रहता  हैं

नाभी umbilicus 

आमाशय stomach and jejunum

स्वेद sweat 

लसिका Lymph 

रक्त    Blood 

रस धातू Plasma

आँख Eyes

त्वचा Skin


इन स्थानो मे पित्त रहकर शरीर के कार्य करता रहता हैंl जब पित्त असंतुलित होता हैं तो सबसे पहिले यही स्थान में उसके लक्षण दिखाई देना शुरू होते हैं l

जैसे आँखो में लाल होना, जलन होना.

ॲसिडिटी, शरीर में दाह होना, त्वचा के व्याधी आदी l


नाभी पित्तका विशेष स्थान हैं l


नाभिरामाशयो स्वेदोलसिका रुधिरं रस: l

दृकस्पर्शनं च पित्तस्य नाभिरत्र विशेषत: ll अ. हृ.12/2


पित्त का असंतुलन होता हैं तो  आयुर्वेदिक शास्त्र ने विरेचन करने को कहा हैं l

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Vd Pratibha Bhave 

BAMS,

MD Ayu obstetrics and gynaecology 

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Regimen of diet according to Ayurveda (भोजन करण्याचे आयुर्वेदोक्त नियम)

1) काले – Food should be taken at the proper time, 2)   सात्म्ये-food should be familial, acceptable  3) शुचि – it should be clean 4) हितं -...