Friday, 22 August 2025

आयुर्वेद #पंचकर्म उपचार मे बस्ति चिकित्सा

 वातप्रधान दोषों में अथवा केवल वात के कारण होनेवाले रोगों में बस्ति दी जाती है l


पंचकर्मोमे ‘बस्ति’चिकित्सा श्रेष्ठ, अग्रणी है l


#बस्ति शरीर मे प्रविष्ट करने के लिये 3 मार्ग है l

गुदमार्ग (Anus)

मूत्रमार्ग(Urethra)

योनीमार्ग (Vagina)


जब औषधी,काढे के रुप मे देते है तो उसे निरुहबस्ति या आस्थापन बस्ति कहते है l

बस्ति जब तेल स्वरूप मे देते है तो उसे

 अनुवासन बस्ति कहते है l


योनीमार्ग से गर्भाशय मे और मूत्र मार्ग से मूत्राशय मे बस्ति देते है उसे #उत्तरबस्ति कहते है l


बस्ति कब, कौनसी, कितनी मात्रा देनी है , यह रोगोंका का स्वरूप, ऋतु, वय, पचनशक्ती आदीं परीक्षण करके  देते है l


वैद्य द्वारा बताये गये नियमों का पालन करते हुए,

युक्ती से बालक, वृद्ध , मुसाफिर, हमाल, व्यायाम, फ्रॅक्चर,चिंता करनेवाले, निर्बल, अमीर, गरीब, स्त्री, पुरुष सबको बस्ति दे सकते है l


कपडे को अगर रंगयुक्त पानी मे भिगोने से, वह कपडा रंगीत हो जाता है, उसीप्रकार  बस्ति चिकित्सा 

शरीर मे  संचित सिर्फ मल को निकालती है l 


यथा कुसुम्भादियुतात्तोयाद्रागं हरेत्पट: l

तथा द्रवीकृतात्देहात्बस्ति :निर्हरते मलान् ll 84ll


सब रोग का कारण बिघडा हुआ बढा हुवा वायु है और वायू के शान्ति के लिये बस्ति के सिवाय दूसरी चिकित्सा नहीं l


बस्ति चिकित्सा संपूर्ण चिकित्सा प्रकारोंका आधा भाग है, कई आचार्य बस्ति को संपूर्ण चिकित्सा मानते है l


तस्या अतिवृद्ध्यस्य शमाय नान्यद्वस्तेर्विना भेषजमस्ति किंचित् ll86ll

तस्मात् चिकित्सार्ध्य इति प्रदिष्ट: कृत्स्ना चिकित्सा s पि च बस्तिरेकै: l


 सर से पांव तक सभी व्याधी मे बस्ति चिकित्सा से लाभ होता है l


वातोल्बणेषु दोषेषु  वाते वा बस्तिरिष्यते l

उपक्रमणां सर्वेषां सो sग्रणी  स्त्रिविधस्तु स: ll1ll

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संदर्भ: अष्टांग हृदय सूत्रस्थान अध्याय 19

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Vd Pratibha Bhave 

Ayurvedic Gynaecologist Pune 

8766740253

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