वातप्रधान दोषों में अथवा केवल वात के कारण होनेवाले रोगों में बस्ति दी जाती है l
पंचकर्मोमे ‘बस्ति’चिकित्सा श्रेष्ठ, अग्रणी है l
#बस्ति शरीर मे प्रविष्ट करने के लिये 3 मार्ग है l
गुदमार्ग (Anus)
मूत्रमार्ग(Urethra)
योनीमार्ग (Vagina)
जब औषधी,काढे के रुप मे देते है तो उसे निरुहबस्ति या आस्थापन बस्ति कहते है l
बस्ति जब तेल स्वरूप मे देते है तो उसे
अनुवासन बस्ति कहते है l
योनीमार्ग से गर्भाशय मे और मूत्र मार्ग से मूत्राशय मे बस्ति देते है उसे #उत्तरबस्ति कहते है l
बस्ति कब, कौनसी, कितनी मात्रा देनी है , यह रोगोंका का स्वरूप, ऋतु, वय, पचनशक्ती आदीं परीक्षण करके देते है l
वैद्य द्वारा बताये गये नियमों का पालन करते हुए,
युक्ती से बालक, वृद्ध , मुसाफिर, हमाल, व्यायाम, फ्रॅक्चर,चिंता करनेवाले, निर्बल, अमीर, गरीब, स्त्री, पुरुष सबको बस्ति दे सकते है l
कपडे को अगर रंगयुक्त पानी मे भिगोने से, वह कपडा रंगीत हो जाता है, उसीप्रकार बस्ति चिकित्सा
शरीर मे संचित सिर्फ मल को निकालती है l
यथा कुसुम्भादियुतात्तोयाद्रागं हरेत्पट: l
तथा द्रवीकृतात्देहात्बस्ति :निर्हरते मलान् ll 84ll
सब रोग का कारण बिघडा हुआ बढा हुवा वायु है और वायू के शान्ति के लिये बस्ति के सिवाय दूसरी चिकित्सा नहीं l
बस्ति चिकित्सा संपूर्ण चिकित्सा प्रकारोंका आधा भाग है, कई आचार्य बस्ति को संपूर्ण चिकित्सा मानते है l
तस्या अतिवृद्ध्यस्य शमाय नान्यद्वस्तेर्विना भेषजमस्ति किंचित् ll86ll
तस्मात् चिकित्सार्ध्य इति प्रदिष्ट: कृत्स्ना चिकित्सा s पि च बस्तिरेकै: l
सर से पांव तक सभी व्याधी मे बस्ति चिकित्सा से लाभ होता है l
वातोल्बणेषु दोषेषु वाते वा बस्तिरिष्यते l
उपक्रमणां सर्वेषां सो sग्रणी स्त्रिविधस्तु स: ll1ll
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संदर्भ: अष्टांग हृदय सूत्रस्थान अध्याय 19
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Vd Pratibha Bhave
Ayurvedic Gynaecologist Pune
8766740253
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