Friday, 22 August 2025

वर्षा ऋतुचर्या (Monsoon Season Regimen)

 स्वस्थ रहने के लिए ऋतु के अनुसार खान, पान, विहार आयुर्वेद मे विस्तार से बताया है 


 शिशिरो s थ वसन्तश्च ग्रीष्मो वर्षाशरद्विमा: ll1ll 


भारत देश मे 6 ऋतु दिखाई देते हैं l


 आचार्य सुश्रुत के काल मे भाद्रपद अश्विन  महिने मे वर्षा ऋतु के बताया हैं l


उनके बाद आचार्य वाग्भट हुए l तब श्रावण व भाद्रपद  महिने  मे वर्षा ऋतु की लक्षण बताये है l


अभी 2025 साल मे तो  वैशाख ज्येष्ठ महिने मे वर्षा ऋतु के लक्षण प्रस्थापित हुये हैं l 


इसलिए स्वस्थ रहने के लिए ऋतु के लक्षण का अनुसरण करना ,आहार का विहार करना बहुत महत्वपूर्ण है l


वर्षा ऋतु मे आकाश पानी से भरे बादलोंसे घिरा रहता है l तुषार मिश्रित वायु एकदम चलती रहती है, पृथ्वी के बाष्प के कारण, अम्लपाकी,मलिन पानी के कारण पचनशक्ती मंद हो जाती है l 


तुषार युक्त वायु+बाष्प+अम्लपाकी,मलिन पानी +पचनशक्ती मंद = वात पित्त कफ दूषित होते है 


वर्षा ऋतुचर्या:- 


भजेत्साधारणंसर्वमूष्ण स्तेजनं च यत्ll44 ll


साधारण आहार विहार करे l उष्ण गुण के पदार्थ , पचन शक्ती बढाने वाले पदार्थोंका खान पान मे प्रयोग करे l


आस्थापनं शुद्धतनुर्जीर्णं धान्यं रसान् कृतान् l —------------45-48 


औषधी काढे के,(आस्थापन) बस्ती ले l 


1 साल पुराने गहू तांदूळ,डाळ , ज्वार इत्यादी अन्नपदार्थ आहार मे लेना चाहिए l 


पुराने अन्नपदार्थ पचनेमे हलके होते है, कफ पित्त भी दूषित नहीं होते l 


जंगली पशु के मांस सूप या  मूग दाल सूप को तेल, घी, सुंठ, पिंपली, चित्रक, चव्य, पिपलीमूल  आदी से छोंक देकर गरम गरम पीना चाहिए l दही को कपडे मे बांधकर पानी निकाले, पानी को मस्तु कहते है l 


मस्तु मे भरपूर नमक डालकर या सुंठ, पिंपली, चित्रक, चव्य, पिपलीमूल मिलाकर पीना चाहिए l खट्टा, नमक, घी तेल युक्त पचनेके लिये हलका भोजन करेl


बिना पानीवाले, सूखे पदार्थोंका भोजन मे प्रयोग करे lपुराने शहदका खान पान मे प्रयोग करे lपुराने आसव अरिष्ट का प्राशन करे l आकाश से गिरनेवाला जल,कुएँ का जल उबालकर शुद्ध  करके खान पान के लिए उपयोग करे l


दिव्यं कौपं शृतं चाम्भो भोजनं 


त्वति दुर्दिने ll 46ll 


व्यक्ताम्ल लवण स्नेहं संशुष्कं क्षौद्रवल्लघु ll


वर्षा ऋतु मे पैदल न चले,किसी वाहन का उपयोग करे l सुरभी गंध धारण करे l 


वस्त्रोंको रोज धूप देवे l मकान मे उची जगह पर जहाँ बाष्प, शीत और शीकर (जलकण) न पहूँच सकें वहा वहां रहेl 


अपादचारी सुरभि: सततं धूपितांबर: ll47ll हर्त्यपृष्ठे वसेत् बाष्पशीतशीकर वर्जिते l


नदी का जल , पानी मे मिले सत्तू, दिन में सोना, परिश्रम, धूप से बचे l


संदर्भ:-अष्टांग हृदय सूत्रस्थान  अध्याय 3 


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Vd Pratibha Bhave 


Sukhkarta ayurvedic panchkarma and family centre Pune 


8766740253

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